गुड़गांव, ब्यूरो : इंडियन वाटर वर्क्स एसोसिएशन मुंबई के सदस्य और साहित्यकार राजीव आचार्य के अनुसार जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर जीवन के भविष्य के लिए एक बड़े खतरे के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित 17 सतत विकास लक्ष्यों में से एक जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए तत्काल कदम उठाना भी शामिल है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक चर्चाओं का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि इनके प्रभाव अब विश्व के हर क्षेत्र में महसूस किए जा रहे हैं। 2024 में, भारत समेत विश्वभर में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं जो इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिक मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इसके समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। पेरिस समझौते जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का पालन और समर्थन करना एक वैश्विक मजबूरी बनती जा रही है।
राजीव आचार्य कहते है कि पर्यावरण में परिवर्तन की बात करें तो प्रतिदिन कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का अनुमान लगाने के लिए ब्रिटिश कोलंबिया बिल्डिंग परफॉर्मेंस स्टडी डेटाबेस का उपयोग किया गया, जिसे एक औसत अस्पताल में प्रतिदिन आने वाले मरीजों की संख्या से विभाजित किया गया, जो 154 थी। इस प्रकार स्वास्थ्य सेवा भी दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन के 4.4% के लिए जिम्मेदार बताई जा रही है । अस्पताल, जो रोगी की देखभाल के लिए बहुत सारे संसाधनों जैसे अल्ट्रासाउंड , सीटी स्कैन , एम.आर.आई. आदि का उपयोग करते हैं उनमें उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है। नेशनल ओशिएनिक एंड एटमोस्फिरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) की ग्लोबल मॉनिटरिंग लैब की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर वैश्विक औसत वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड 2023 में 419.3 पार्टस पर मिलियन (पीपीएम) थी, जिसने एक नया रिकॉर्ड बनाया। वर्ष 2022 और 2023 के बीच इसमें 2.8 पीपीएम की वृद्धि हो चुकी है।
*भारत के कई हिस्सों में तापमान पहुंचा 45 पार*
द लैंसेंट प्लेनेटरी हेल्थ की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक अत्यधिक गर्मी और जलवायु परिवर्तन से अनेक प्रकार की बीमारियों डेंगू, मलेरिया, और अन्य वेक्टर-बोर्न बीमारियों में वृद्धि हो रही है । इसके अलावा, अधिक तापमान की वजह से हीटस्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी वृद्धि हुई। 2024 में भारत में गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि देखी गई। उत्तर भारत के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ और कई लोगों की जान भी गई।राजीव आचार्य कहते है कि अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की 5 वी रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के लिए एक चेतावनी है जो यह कह रही है कि यदि हमने समय पर कार्यवाही नही की तो पृथ्वी का तापमान 2100 तक 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा । केवल तापमान ही नही बल्कि मानसून के दौरान कई स्थानों पर बेमौसम बारिश और बाढ़ की घटनाएं भी हुईं। केरल, महाराष्ट्र, और असम जैसे राज्यों में बाढ़ से व्यापक क्षति हुई, जिससे हजारों लोग बेघर हो गए और फसलें नष्ट हो गईं। बदलते मौसम पैटर्न का असर कृषि पर भी पड रहा है ।खरीफ और रबी की फसलें प्रभावित हुईं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। तापमान में वृद्धि और असामयिक बारिश ने फसलों की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव डाला।
*अमेरिका में जंगल की आग बढ़ी, ऑस्ट्रेलिया सूखा*
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का संतुलन बिगड़ चुका है । राजीव आचार्य नेशनल सेंटर्स फॉर इन्वायरमेंटल इंफोर्मेशन की अप्रैल में जारी हुई ग्लोबल क्लाईमेट चेंज की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि 2024 में दुनिया की सतह के 14.7% हिस्से ने एक विशेष महीने के लिए अब तक का सबसे ज्यादा तापमान अनुभव किया है। यह अप्रैल 2016 में बनाए गए पिछले रिकॉर्ड से 7.5% से ज्यादा है। 2024 में आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में बर्फ पिघलने की गति में तेजी आई। इससे समुद्र स्तर में भी वृद्धि हो रही है, जो तटीय क्षेत्रों और द्वीपीय देशों के लिए खतरा बन गया है। वैश्विक महासागरों का तापमान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। समुद्र के तापमान में वृद्धि से समुद्री जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अमेरिका में जंगल की आग, यूरोप में हीटवेव और बाढ़, ऑस्ट्रेलिया में सूखे जैसी घटनाएं ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज के प्रत्यक्ष प्रभाव हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बेघर होने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। बांग्लादेश, मालदीव, और प्रशांत द्वीप देशों में समुद्र स्तर में वृद्धि से लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
*वैज्ञानिकों और वैश्विक संगठनों ने दिए सुझाव*
2024 में हुए इन बदलावों ने वैश्विक समुदाय को क्लाइमेट चेंज के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। दुनियाभर के वैज्ञानिक और पर्यावरण पर काम करने वाले संगठन इस स्थिति पर तत्काल काबू करने के लिए सुझाव दे रहे हैं। उनके अनुसार सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का अधिकतम उपयोग करना होगा, ताकि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो सके। वनों की कटाई को रोकने और वृक्षारोपण अभियानों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इससे कार्बन अवशोषण की क्षमता बढ़ेगी और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित किया जा सकेगा।
*हम क्या कर सकते है*
राजीव आचार्य के अनुसार जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समाज में जागरूकता आवश्यक है। पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। पेड़ों का कटान से ग्रीन हाउस उत्सर्जन की समस्या बढ़ रही है । वाहनों , एयर कंडीशनर के अंधाधुंध प्रयोग भी एक कारण है। हमे जलवायु परिवर्तन की विभीषिका से निपटने के लिए खुद आगे आना होगा ।
*1-* पानी की बरबादी होने से रोकें । घर में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का प्रयोग करें ।
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*2 -* पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग अधिक से अधिक करें ।
*3*- सौर उर्जा का प्रयोग करें।
*4-* अधिक से अधिक पेड़ लगाए और लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें । पेड़ ही जलवायु परिवर्तन को रोकने में मददगार हो सकते हैं ।
*5-* यदि जगह न हो तो गमले का प्रयोग करें ।
*6*- पर्यावरण के प्रति जागरूक करने वाली संस्थाओं से जुड़े।https://m.haryana.punjabkesari.in/gurgaon/news/climate-change-serious-warning-save-water-rajeev-aacharya-1995397