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नई ऊर्जा है मकर संक्रांति | लेख : राजीव आचार्य


मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि नई ऊर्जा, नए संकल्प और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है।
हिंदू संस्कृति में यह पर्व विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जिसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। उत्तरायण का काल जीवन में प्रकाश, आशा और उन्नति का संकेत देता है।

मकर संक्रांति के साथ ही ऋतु परिवर्तन होता है। ठंड की विदाई और बसंत के आगमन की आहट मानव जीवन में नई चेतना का संचार करती है। इस पर्व को देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है—कहीं यह खिचड़ी, कहीं पोंगल, तो कहीं उत्तरायण के रूप में प्रसिद्ध है।

इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। तिल, गुड़, अन्न और वस्त्रों का दान न केवल सामाजिक समरसता को बढ़ाता है, बल्कि आत्मिक शुद्धि का भी माध्यम बनता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति से जुड़े कर्म मनुष्य के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाते हैं।

धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति का संबंध भगवान सूर्य से है। सूर्य को जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्रोत माना गया है। इस दिन सूर्य उपासना, स्नान और ध्यान से व्यक्ति मानसिक व शारीरिक रूप से सशक्त होता है।

आज के आधुनिक युग में भी मकर संक्रांति हमें प्रकृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि परिवर्तन को स्वीकार कर सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना ही जीवन का सार है।

मकर संक्रांति वास्तव में नई ऊर्जा, नए विचार और नए भारत के निर्माण का संदेश देती है।

— राजीव आचार्य