नई दिल्ली, जागरण डेस्क। मानव पाषाण युग , लौह युग , हिमयुग , ताम्र युग आदि में रह चुका है और अब वह प्लास्टिक युग में जी रहा है । आज हमारे जीवन का कोई भी हिस्सा ऐसा नही है जो प्लास्टिक से अछूता हो । सुबह उठकर ब्रश करने से लेकर रात को नाइट बल्ब का स्विच ऑफ करने तक सभी प्लास्टिक से जुड़े है। उत्तर प्रदेश के जल विभाग में कार्यरत सीनियर ऑफिसर और इंडियन वाटर वर्क्स एसोसिएशन मुंबई के सदस्य राजीव आचार्य कहते हैं कि प्लास्टिक एक स्लो पॉइजन है जो हमारे पर्यावरण के साथ साथ मानव शरीर को भी धीरे धीरे अपनी चपेट में ले रहा है । यह कितना खतरनाक है इसका अंदाजा जर्नल इन्वायरमेंट हेल्थ पर्सपक्टिवेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट से समझा जा सकता है जिसके अनुसार माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर में घुसकर ह्रदय , ब्रेन , लीवर संबंधी गंभीर बीमारियां पैदा कर रहे है । माइक्रोप्लास्टिक ब्रेन और ह्रदय की धमनियों में ब्लाकेज बना रहे है जो अत्यंत खतरनाक है । यही कारण है कि आज समूचा विश्व प्लास्टिक से निजात पाने की कोशिश कर रहा है । राजीव आचार्य के अनुसार ” वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ” की एक रिपोर्ट के अनुसार समूचे विश्व की तेल खपत का 4 से 8 प्रतिशत सीधे प्लास्टिक से जुड़ा है और यह निर्भरता 2050 तक 20 प्रतिशत तक होने की संभावना है ।
BY JAGRAN NEWS THU, 23 MAY 2024 08:37 PM (IST)
ओटावा सम्मेलन
इस प्लास्टिक के स्लो पॉयजन से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा अप्रैल, 2024 को कनाडा की राजधानी ओटावा में एक महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस “प्लास्टिक शिखर सम्मेलन” में दुनिया भर के नेताओं, वैज्ञानिकों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने एकत्र होकर प्लास्टिक प्रदूषण की गंभीर समस्या का समाधान खोजने पर चर्चा की।
सम्मेलन के दौरान प्रतिभागियों ने प्लास्टिक प्रदूषण के गंभीर परिणामों पर प्रकाश डाला। यद्यपि सभी देश एक मत से किसी कानूनी संधि पर सहमत नही हुए परंतु सभी ने प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। यह सहमति प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए विभिन्न प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करती है। ये प्रतिबद्धताएं निम्नलिखित हैं:
नई तकनीकों में निवेश : जैविक रूप से विघटित प्लास्टिक जैसे नई तकनीकों के विकास में निवेश करना प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए आवश्यक है।
जागरूकता बढ़ाना: प्लास्टिक प्रदूषण के खतरों के बारे में जनता को शिक्षित करना और जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।
हालांकि ओटावा घोषणा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, यह प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ वैश्विक स्तर पर कार्रवाई करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यह देखना बाकी है कि क्या देश और व्यवसाय अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सक्षम होंगे।
एक रिपोर्टका हवाला देते हुए राजीव आचार्य कहते हैं कि वर्तमान में दुनियाभर में लगभग 400 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है और उपयोग में भी लिया जा रहा है। वैश्विक
कचरा 2060 वर्ष तक तीन गुना हो जायेगा , यही नहीं, अब तक तैयार हुए कुल प्लास्टिक में से मात्र 10 प्रतिशत से भी कम प्लास्टिक को रीसाईकिल किया जा सका है। यही कारण है कि
ओटावा में आयोजित प्लास्टिक शिखर सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण के संकट के बारे में जागरूकता बढ़ाने और अधिक टिकाऊ भविष्य की दिशा में सामूहिक कार्रवाई शुरू करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य करने की भरसक कोशिश की है।
राजीव आचार्य के अनुसार प्लास्टिक युग एक गंभीर समस्या है, जिसे हम मिलकर ही हल कर सकते हैं। अपनी आदतों में बदलाव लाकर और प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ने वाले संगठनों का समर्थन करके, हम प्लास्टिक युग से निजात पा सकते हैं ।
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